कांग्रेस में छाया प्रोटेम स्पीकर बोपैया का खौफ, पलट सकते हैं सत्ता का पांसा

कर्नाटक में वरिष्ठ कांग्रेस विधायक को नजरअंदाज कर भाजपा विधायक केजी बोपैया को प्रोटेम स्पीकर (कार्यवाहक विधानसभा अध्यक्ष) नियुक्त किए जाने के फैसले को कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी है। देश की राजनीति में स्पीकर की भूमिका बहुत अहम रही है।

कई बार लोकसभा और विधानसभा के अंदर बहुमत का आंकड़ा स्पीकर के फैसलों की वजह से बदल गया। शिवराज पाटिल, केएच पांडियन, गोविंद सिंह कुंजवाल, धनीराम वर्मा या केसरीनाथ त्रिपाठी की स्पीकर के तौर पर सभी की भूमिका विवादों में रही है।

एक संसदीय समिति की 1970 में दी गई रिपोर्ट के अनुसार, देश के आजाद होने के बाद 17 सालों में 542 बाद दलबदल हुआ। इसलिए संसद ने दलबदल निरोधक कानून बनाया जिसमें पहले कम से कम एक तिहाई विधायकों के पाला बदलने को ही संवैधानिक करार दिया गया था। मौजूदा समय में अब यह दो तिहाई कर दिया गया है। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि कर्नाटक में भाजपा के पास अभी बहुमत साबित करने लायक विधायकों का जुगाड़ नहीं हो पाया है। ऐसे में वह और वक्त चाहती है।

कांग्रेस को आशंका है कि येदियुरप्पा द्वारा शनिवार दोपहर को विधानसभा में पेश किए जाने वाले विश्वास प्रस्ताव को बोपैया ध्वनि मत से पारित करने के बाद बिना मतदान कराए विधानसभा को स्थगित कर देंगे। कोर्ट में इसे चुनौती देने और फैसला आने में समय लगेगा। इस बीच भाजपा को बहुमत जुटाने का पर्याप्त समय मिल जाएगा।

पाटिल ने निकाला था नए दल के अंदर एक और विभाजन का तरीका

वर्ष 1990 में वीपी सिंह सरकार के गिरने के बाद कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर की सरकार बनी तो उसमें तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल की अहम भूमिका थी। उन्होंने जनता दल से निष्कासित सांसदों को अलग दल का दर्जा देकर कांग्रेस की मदद की थी। उन्होंने ही स्प्लिट विदइन स्प्लिट (यानी विभाजन कर बने नए दल के अंदर एक और विभाजन) का नया तरीका निकाला।

केसरीनाथ ने भी पाटिल का तरीका अपनाया
पाटिल का तरीका उत्तर प्रदेश के तत्कालीन स्पीकर केशरीनाथ त्रिपाठी ने 2003 में भाजपा का समर्थन करने वाले उन बसपा विधायकों के लिए अपनाया था जो कुल मिलाकर अपने विधायक दल का एक तिहाई नहीं हो रहे थे।

त्रिपाठी के मुताबिक, बसपा छोड़ने वाले विधायक एक तिहाई थे जिनमें से आधे वापस पार्टी में लौट गए थे। इसके बाद दलबदल कानून के तहत अलग दल बनाने के लिए संख्या एक तिहाई से बढ़ाकर दो तिहाई कर दी गई। बाद में बसपा द्वारा अपने बागी विधायकों की सदस्यता खत्म करने की याचिका निपटाने में त्रिपाठी ने करीब तीन साल लगा दिए यानी तब तक विधायकों ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया था।

धनीराम ने विश्वास मत ही नहीं होने दिया
जून 1995 में जब उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन सरकार टूटी और भाजपा के समर्थन से मायावती ने सरकार बनाई तो सपा के स्पीकर धनीराम वर्मा ने बिना विश्वास मत हुए विधानसभा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी थी लेकिन विधानसभा में मौजूद भाजपा-बसपा विधायकों ने एक राय से बसपा के बरखूराम वर्मा को स्पीकर चुना और सरकार में विश्वास व्यक्त किया।

बिना किसी कारण के कुंजवाल ने विधायकों को अयोग्य ठहराया
दो साल पहले उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने कांग्रेस के नौ विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया। हालांकि उन्होंने न तो पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया था और न ही पार्टी छोड़ी थी। कांग्रेस द्वारा उन पर तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ भाजपा द्वारा लाए अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने का संदेह था। हालांकि बाद में फैसला हाईकोर्ट से कांग्रेस के पक्ष में ही आया।

ये भी उदाहरण
वर्ष 1988 में तमिलनाडु विधानसभा के स्पीकर पीएच पांडियन ने द्रमुक की मदद के लिए अन्नाद्रमुक के छह मंत्रियों सहित 33 विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया था।

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